Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
साहंतादिजगच्छान्तौ बोधे संवित्कलात्मनि ।
संशान्तदीपसंकाशस्त्यागः सिद्ध्यति नान्यथा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
इसका आत्मबोध से अनहंभाव की भावना करने पर त्याग हो जाता है, यह वर्णन ।
सम्पूर्ण दृश्यों का त्याग ही कष्टा आत्मा का मोक्ष हैं तेल खतम हो जाने पर दीप-निर्वाण के
समान तत्वज्ञान से सम्पूर्णा दृश्य प्रयव के मूल अज्ञान का निर्वाण (नाश) हो जाने पर ही वह सिद्ध
होता हैं, अन्यथा नहीं; यह कहते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, चेतन आत्मरूप तत्त्वबोध हो जाने पर जब अहन्तादि
के सहित जगत् शान्त हो जाता है तब तेल समाप्त हो जाने पर जैसे दीप बुझ जाता है वैसे ही सब
दृश्य प्रपंचों का त्याग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं
सर्ग सन्दर्भ
तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्ग अहन्ता ही संसार का मूल है ।