Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
यो यो भाव उदेत्यन्तस्त्वयि स्पन्द इवानिले ।
नाहमस्मीति चिद्वृत्त्या तमनाधारतां नय ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
हजारे युकितयो के प्रदर्शन से कोड प्रयोजन नहीं है केवल वेह्ादि मैं नहीं हूँ. अकेली इस
भावना का अभ्यास कर लेने पर ही सव भ्रान्तियाँ निकल जायेगी, यह कहते हैं /
श्रीरामजी, वायु में क्रिया के सदुश आपके भीतर जो-जो भाव उत्पन्न होते हैं, उन-उन भावों
के आप 'मैं भावरूप नहीं हू इस तरह की भावनावृत्ति से अपने को अनाश्रय बना दीजिये