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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

न भ्रमो भ्रमणं नैव न भ्रान्तिर्भ्रामकोऽस्ति वा । अनालोकनमेवेदमालोकान्नेदमस्ति ते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रम, श्रमसाधन, भ्रमफल एवं उनके आश्रय सभी ज्ञानमात्र के परिणाम हैं; इसलिए अज्ञान की निवृत्ति हो जाने पर उनका पृथकू अस्तित्व नहीं है, यह कहते हैं न भ्रम है, न भ्रम का साधन है,न भ्रम का फल है और न भ्रम का आश्रय ही है, जो कुछ है, वह सब अज्ञान ही है, इसलिए जब आपको तत्त्वज्ञान हो जायेगा तब उसी से आप में उनकी सत्ता नहीं रहेगी