Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 39
अड़तीसवाँ सर्ग समाप्त ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ आदिकवि श्रीमद्वाल्मीकिमहामुनिप्रणीत श्रीं योगवासिष्ठ महारमायण परमहंस श्रीमद् आनंद बोधैन्द्र सरस्वती प्रणीत “श्रीवासिष्ठ महारामायण' (तात्पर्यप्रकाशाख्यव्याख्यासहित) का हिन्दी अनुवाद निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध उनतालीसवों सर्ग प्रबुद्ध आत्मा में विश्रान्त तत्त्वज्ञानी का जो स्वरूप रहता है उसका तथा जगत् जिस रूप का रहता है, उसका वर्णन।
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- Verse 1यदि तत्वज्ञ के ऊपर शाख़ानुस्रण का नियन्त्रण रकक््खा जाय, तो उम्नमें शाखानुसरण का संकल्प…
- Verse 2ज्ञानवान संकल्प नहीं जानता इस उक्ति का विकरण करने के निष (तत्वद्रष्टा में समस्त संकल्प का…
- Verse 3दूसरी बात यह हैँ कि कामना से संकल्प उठते-रहते हैं; वह तो तत्वदर्शी में है नहीं; क्योकि उस…
- Verse 4जैसे एक वस्तु के लाभ से सब वस्तुओं का लाभ हो जाने से फिर लाभयोग्य वस्तु के लिए सकल्य नहीं…
- Verse 5संसारशून्य, सन्देहनिर्मुक्त, आत्मप्रकाश प्राप्त कर लेनेवाला, आवरणात्मक अज्ञान से शून्य तथ…
- Verse 6संकल्पमुक्त, पराधीनता से रहित, भीतरी शीतलता से युक्त शान्त तत्त्वदर्शी की प्रणाम, शुश्रुष…
- Verse 7(तत्वज्ञ संकल्य नहीं जानता“ इस एवोक्त अंश का स्पष्टीकरण करके अब तेनासदेव सः“ ङस बचे अंश क…
- Verse 8यह जगत् तो वास्तव में असत् ही है, परन्तु उसकी जो उपलब्धि होती है, यही सद् आत्मस्वरूप क…
- Verse 9स्वप्नज्ञान और व॑ध्यापुत्रज्ञान की तरह यह जो व्रब्टातत दिया ग्या हैं, इसकी समानता बताते ह…
- Verse 10भद्र, यह जगत् ब्रह्मरूप से सत्य है, वह न तो उत्पन्न हुआ है, न भावना का विषय है ओर न किसी…
- Verse 11सत्-रूय वस्तु के अज्ञान का स्वभाव बतलाकर अब आत्मज्ञान में प्राप्त विश्रान्ति का जो असली…
- Verses 12–14है, उस स्वभाव में स्थित विवेकी का सृष्टिज्ञान चूर -चूर हो जाता है
- Verse 15छदप्ति ओर स्वप्न में जैसे एक दूसरे की विक्यता नहीं हैं, कैसे ही दुरीय में भी जाग्रत आदि क…
- Verse 16चुष॒प्ति आदि विभाग भी श्रान्तियूलक ही हैं, इसलिए वह परमार्थ नहीं हो सकता, यह कहते हैं / य…
- Verse 17स्वप्नादि क्यों नहीं हैं; इस पर कहते हैं जो भ्रान्ति है उसका असली स्वरूप असदात्मक ही है,…
- Verse 18श्रान्ति का अर्थ यद्यपि श्रान्ति से भले ही न आप्त किया जा सकता हो, परन्तु दूसरे किसी उपलम…
- Verse 19ऐसी स्थिति में खूब विचार करने पर अकेला स़ाक्षिस्वभाव ही अपने में त्रिपुटी की कल्पना कर प्…
- Verse 20उसको स्वभावभिन्न मानना ही संसारकूप दु:ख है और कल्पनाराहित अपनी आत्मा में स्थित रहना मोक्ष…
- Verse 21इष्ट कस्तु के ग्रहण में उपाय क्या हैं 2 इस प्रश्न पर अध्यस्त ससार मे आत्यरूपता का अवलोकन…
- Verse 22इस तरह प्रत्यगात्सा मे विद्यमान आध्यात्मिक भावों की भी प्रथक् सत्ता नहीं है, इसका अपने म…
- Verse 23जैसे अवयवी (घटादि) अपने सदुश यानी अपने अस्तित्व से अलग अस्तित्व न रखनेवाले अवयवों से ही क…
- Verse 24अथव्यवहार के सदश शब्दप्रयोग आदि व्यवहार भी आत्मसत्ता से पथक् सत्ता न रखकर ही वेतनाधिष्ठि…
- Verse 25उक्त रीति से सम्पूर्ण व्यवहार का वेतन्य के साथ अभिन्नता मे जब निर्वाह किया जा सकता है, तब…
- Verse 26अससारी ब्रह्म अपने स्वभाव में भले ही रहे, इसे सारि को क्या लाभ पहुँचा, इस तरह की आशंका कर…
- Verse 27हम लोगो में ऐसे पुरुष और उनके व्यवहार जड़ अंश को लेकर तो आकाशपुष्प के सदश हैं ओर स्रच्चिद…
- Verse 28दसरा विशेष बतलाते हैं । जैसे स्वप्नवालों को स्वप्न सन्मय प्रतीत होता है, वैसे ही अज्ञानिय…
- Verse 29अनुग्रह, उपदेश आदि जो मेरा व्यवहार उनके साथ होता है, वह मेरी दृष्टि में स्वस्वरूप में स्थ…
- Verse 30भद्र, मैं वसिष्ठादिभाव में नहीं हूँ, किन्तु स्वस्वरूप से परब्रह्म परमात्मा में ही हूँ। आप…
- Verses 31–32सभी वस्तुओं में आनन्दैकरसात्मता के दर्शन से विरुद्ध दुःखादि पदार्थ भी जिसको अविरुद्ध प्रत…
- Verse 33मनुष्यों का बन्धन से जो यह मुक्तिक्रम है वह तो केवल अपने अधीन है, फिर भी मोह से (अविरुद्ध…
- Verse 34जैसे तेल का बिन्दु जल में गिरकर नाना वर्णो के चक्ररूप में परिणत हो जाता है वैसे ही विषयों…
- Verse 35ज्ञान से बाधित हुआ संसार तो स्वप्न की तरह स्मृति की एकमात्र लकीर बन जाता है, यह कहते हैं…
- Verse 36उक्त भूमिका के अभ्यासरूप योग से वह जगत्-जाल ऐसे क्षीणता को प्राप्त करता है, जैसे कि फिर…
- Verse 37तत््वद्रष्टि से परीक्षा करने पर इस समय भी उसका विनाश और बाध जाना जा सकता हैं, इस आशय से क…
- Verse 38भोगान्धकार की (संसारान्धकार की) निवृत्ति हो जाने पर बुद्धि आदि करणो का दल अज्ञानरूप आवरण…