Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अहमात्मनि नैवास्मि ब्रह्मसत्तेयमातता ।
त्वदर्थं समुदेतीव तथारूपैव वागियम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, मैं वसिष्ठादिभाव में नहीं हूँ, किन्तु
स्वस्वरूप से परब्रह्म परमात्मा में ही हूँ। आपके लिए यह वसिष्ठ आदि के आकार से व्यापक ब्रह्मसत्ता
मानों उदित हुई है । यह मेरी वाणी आदि भी आपके लिए ब्रह्मसत्ताविवर्तरूप ही है, परन्तु मेरी दृष्टि
से तो बिलकुल कुछ है ही नहीं