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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

असत्येष्वेव संसारेष्वास्तामर्थः कुतो भवेत् । सर्गापवर्गयोः शब्दावेव वन्ध्यासुतोपमौ ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्नज्ञान और व॑ध्यापुत्रज्ञान की तरह यह जो व्रब्टातत दिया ग्या हैं, इसकी समानता बताते हैं / असत्यरूप ही संसार में अर्थ रहे, यदि यह मान लिया जाय, तो इस पर प्रश्न यह है कि वह किस से उत्पन्न होगा ? अर्थात्‌ क्या सत्य वस्तु से या असत्य वस्तु से । पहला पक्ष तो युक्त नहीं, क्योकि सत्य वस्तु कूटस्थ है, अतः उससे अर्थ की उत्पत्ति हो नहीं सकती । यदि असत्य वस्तु से मान लिया जाय, तो असत्य से जो असत्य की उत्पत्ति होगी, वह भी असत्य ही होगी । इस स्थिति में उक्त अर्थ का आधार कोई हो ही नहीं सकता, क्योकि सत्यकूटस्थ है ओर असत्‌ आश्रय नहीं है । इससे संसार के असत्यभूत होने से जब बन्ध और मोक्ष शब्द ही वन्ध्यापुत्र सदृश हैं, तब उनके अर्था की सिद्धि की तो कथा ही क्या ?