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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

यद्भातं प्रेक्षया नास्ति तन्नास्त्येव निरन्तरम् । जगद्रूपमरूपात्म ब्रह्म ब्रह्मणि संस्थितम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त रीति से सम्पूर्ण व्यवहार का वेतन्य के साथ अभिन्नता मे जब निर्वाह किया जा सकता है, तब वह अभेद आत्यन्तिक ही मानना चाहिए, अविचार प्रिद्ध जड़तारूप भेद मानने से फ़ायदा ही क्या, यह कहते हैं / जो यह आपाततः देखा जाता है, वह विचार से उत्पन्न तत्त्वज्ञान से निरन्तर के लिए अस्तित्व ही खो देता है । इसलिए जड़तारूप जो जगत्‌ का रूप है, वह स्वरूपरहित है, इस स्थिति में ब्रह्म आत्मा ही अपने स्वरूप में स्थित है, यही स्वरूपावस्थिति है