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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सर्वसंदेहदुर्ध्वान्तमिहिकामातरिश्वना । भाति भास्वद्धिया देशस्तेन पूर्णेन्दुनेव खम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे एक वस्तु के लाभ से सब वस्तुओं का लाभ हो जाने से फिर लाभयोग्य वस्तु के लिए सकल्य नहीं होता, केसे ही एक वस्तु के विज्ञान से सव वस्तुओं का विज्ञान हो जाने से ज्ञातव्य विषय में भ्रम आदि दोष रहते नहीं हैं; इससे भी तन्निमित्तक संकल्प तत्वज्ञ को नहीं होता, यह कहते हैं । जैसे पूर्णचन्द्र से आकाश जगमगाता रहता है, वैसे ही सर्वविध आवरणों से रहित प्रकाशमय बुद्धिवाले तथा समस्त सन्देहरूप कुटिल अन्धकारात्मक ओस के लिए वायुस्वरूप उक्त तत्त्वज्ञ से सारा देश जगमगाता रहता है