Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
येषामस्ति जगत्स्वप्नस्ते स्वप्नपुरुषा मिथः ।
न सन्ति ह्यात्मनि मिथो नास्मास्वम्वरपुष्पवत् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अससारी ब्रह्म अपने स्वभाव में भले ही रहे, इसे सारि को क्या लाभ पहुँचा, इस तरह
की आशंका कर उनकी पुरूगार्था चिन्ता; वन्ध्या को अपने पुत्र के लिए ऱज्यप्रप्ति की विन्ता करने
के सद्र मिथ्या है, इस आशय से कहते हैं
जिनकी दृष्टि मे जगत्-रूप स्वप्न भासता है, उन पुरुषों का एक दूसरे की भ्रान्तिपूर्ण दृष्टि से
भी, जाग्रत और स्वप्न में तत्-तत् स्वरूप में अस्तित्व रहता ही नहीं और एक दूसरे के आत्मस्वरूप
हुए हम लोगों में तो आकाशकुसुम के सदृश उनका सर्वथा अस्तित्व नहीं है