Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
सुषुप्ते स्वप्नधीर्नास्ति स्वप्ने नास्ति सुषुप्तधीः ।
सर्गनिर्वाणयोर्भ्रान्ती सुषुप्तस्वप्नयोरिव ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
छदप्ति ओर स्वप्न में जैसे एक दूसरे की विक्यता नहीं हैं, कैसे ही दुरीय में भी जाग्रत आदि की
विष्यता नहीं है, ऐसी सम्भावना की जा सकती है, यह कहते हैं /
सुषुप्ति में स्वप्न की बुद्धि नहीं है और स्वप्न में सुषुप्ति की बुद्धि नहीं है, यह जैसे सबको ज्ञात है,
वैसे ही सृष्टि में मोक्षबुद्धि और मोक्ष में सृष्टिबुद्धि नहीं है यानी सुषुप्ति ओर स्वप्न की बुद्धि के सदृश
सर्ग और मोक्ष की बुद्धि है अर्थात् तुरीय मोक्ष में चिति की सर्गादिविषयता रह ही नहीं सकती