Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मयि ब्रह्मैकरूपं ते शान्तमाकाशकोशवत् ।
वायोः स्पन्दैरिवाभिन्नैर्व्यवहारैश्च तन्मयि ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हम लोगो में ऐसे पुरुष और उनके व्यवहार जड़ अंश को लेकर तो आकाशपुष्प के सदश हैं
ओर स्रच्चिद् अंश को लेकर तो हम लोगो में ब्रह्मस्वभावता से विद्यमान हैं; यह कहते हैं /
वायु के स्पन्दन के सदुश अपने से अभिन्न उन-उन स्वकीय व्यवहारों के साथ वे
स्वप्नपुरुष हममें विद्यमान हैं, क्योंकि ऐसे पुरुष और उनके व्यवहार ये दोनों शान्त परब्रह्मेैकरूप
ही हैं और वह ब्रह्म प्रत्यगात्म-स्वभाव मुझमें है