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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

स्वभाव एव सर्वस्मै स्वदते किल सर्वदा । अनानैव हि नानेव किं वादैः संविभाव्यताम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी स्थिति में खूब विचार करने पर अकेला स़ाक्षिस्वभाव ही अपने में त्रिपुटी की कल्पना कर प्रकाशित होता है दूसरा कुछ भी नहीं; यह कहते हैं / स्त्री के लिए उसका स्वभाव ही निरन्तर उत्तम प्रेम का भाजन बनकर प्रकाशित होता है । इसीसे एक ही वस्तु वह अनेक-सी भासती है। इसलिए अनेक वादों से समर्थन ही क्या किया जाय ?