Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
यदा यदा स्वभावार्कः स्थितिमेति तदा तदा ।
भोगान्धकारो गलति न सन्नप्यनुभूयते ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तत््वद्रष्टि से परीक्षा करने पर इस समय भी उसका विनाश और बाध जाना जा सकता हैं, इस
आशय से कहते हैं ।
जब-जब आत्मारूप सूर्य अपने पूर्ण प्रकाशरूप में स्थिति करता है, तब-तब यह संसाररूप
अन्धकार बाधित हो जाता है, उसका अस्तित्व रहने पर भी परिज्ञान नहीं होता