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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 38

सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तीसवाँ सर्ग चित्‌ और चेत्य (विषय) दोनों के सम्बन्धभ्रम के निरास द्वारा उत्तम युक्तियों से चेतन ही जगत्‌ है यह वर्णन ।

42 verse-groups

  1. Verse 1चेत्यरुप समस्त जग्रत्‌ वेतनस्वरूप ही है डस विषय का उपपादन करनेवाले महाराज वस्िष्ठजी भूमिक…
  2. Verse 2श्रान्ति से कल्या यया यह ससार चित्रम्रृष्टि के स्द्रश केवल मन की कल्पना से ही श्चन्ध-सा भ…
  3. Verse 3कैसा भले ही हो, इससे प्रक्रत में क्या आया 2 इस पर कहते हैं / जैसे दीवार में रहनेवाला चित्…
  4. Verse 4ऐसी स्थिति मेँ हम लोगों के मत से बाह्य अर्थवाद ओर विज्ञानवाद में कोई विरोध नहीं होता, क्य…
  5. Verse 5जब सम्पूर्ण प्रपंच विदेकरत है, चिति निरन्तर ही अश्चुन्ध हैं और समस्त विशेषणों से निर्युक्…
  6. Verse 6यों समस्त क्रियाकरारक फ़लरूप बल्यीयूत जगत्‌ को ही प्रणाम करते हैं । यह सब कुछ ब्रह्म के ल…
  7. Verse 7व्यवहारकाल में भी चिति के साथ ऐक्यप्राप्ति के बल से ही विषयों का अस्तित्व और प्रकाशन होता…
  8. Verse 8इस तरह द्रष्टा, दृश्य ओर दर्शन-ये सभी, चिति की एकता के बल से ही जब सिद्ध होते हैं, तब ये…
  9. Verse 9द्रष्टा ओर दृश्य की एकता में अनुकूल तर्क बतलाते हैं / द्रष्टा और दृश्य यदि चिदात्मक साक्ष…
  10. Verse 10जब द्रश्य और द्रष्टा को चिन्मय मानते हैं, तब अनुभव करनेवाली चिति में ही चेत्य (विषय का) अ…
  11. Verse 11दो काठ के सदश” यह जो व्यतिरेक दष्टान्त दिया है, उसकी समानता दा्ीन्तिक में बतलाते हैं / एक…
  12. Verse 12द्रष्टा ओर दृश्य की जड़ता मान लेने पर कोड भी दो काठ की अपेक्षा उनमें कुछ अधिकता नहीं जान…
  13. Verse 13योंद्रष्टा ओर दृश्य जब चेतनरूप प्रिद्ध हुए, तब द्ृश्यात्यक जयत्‌ मे एथिवी, कायु, जल आदि क…
  14. Verse 14भावनामात्र से कल्पित होने के कारण प्राण आदि भेद निथ्या हैं. यह कहते हैं । भद्र, प्राण, बु…
  15. Verse 15जगत्‌-रूप से एवं सुषुप्ति-प्रलयरूप से ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। आत्मा ही प्रसवशक्ति से आक्…
  16. Verse 16कट के बीज में प्रसवशकित से युक्त सूक्ष्म आविकृत ब्ह्मस्त्तावानाभाय और उसमे वटादिविवर्त दि…
  17. Verse 17जो-जो जिससे सूक्ष्म होकर कारणरूप से प्रसिद्ध ह, वह सव तो ब्रह्मकोटि में है और जो स्थूल हो…
  18. Verse 18जैसे घट आदि एक-एक द्रव्य अगल-बगल से, ऊपर से नीचे से यानी सभी ओर से द्रव्य रूप ही है, उससे…
  19. Verse 19अविकारिता मे दृष्टान्त कहते हैं / सैकड़ों सुवर्णं के रूपों में जैसे सुवर्णत्व ही रहता है,…
  20. Verse 20सत्‌ ब्रह्म का सर्यरुप विवर्तो से अलोप नहीं होता, यह बतलाते हैं। समीपस्थ पुरुष के स्वप्न…
  21. Verse 21आकाश में कल्पित मलिनता और उसी में कल्पित गन्धर्वपुत्रों की सेना जैसे आकाशरूप ही है, वैसे…
  22. Verse 22जैसे जल से भूमितल में आर्द्रं वट आदि का बीज महान्‌ वट आदि के वृक्षों के रूप में परिणत हो…
  23. Verse 23यदि परम सूक्ष्म ब्रह्म है और बह्यभाव में स्थिति ही मोक्ष है, तो अणिमा आदि प्रिद्धियों के…
  24. Verse 24तीनों लोकों में देवता, असुर और मनुष्य से युक्त ऐसी किसी वस्तु को मैं नहीं देखता, जो एक रो…
  25. Verse 25जिस किसी तरह की स्थिति करनेवाले तथा जहाँ कहीं जानेवाले आत्मतत्त्ववेत्ता पुरुष को किसी तरह…
  26. Verse 26जिस महामति की दृष्टि में सारा विश्व ही चिदाकाशरूप तथा शून्यात्मक है, ऐसे भोगादिनिमित्त से…
  27. Verse 27जिसको अशेष विशेषो से शान्ति हो चुकी है तथा जो इच्छाओं से रहित हो गया हे, ऐसे वैभव एवं दरि…
  28. Verses 28–29भा पुत्र आदि के मरणजीवन से उसको हर्ष या शोक नहीं होता; इस आशय से कहते हैं / ज्ञानवान न मर…
  29. Verse 30उत्तम परीक्षा कर लेने के बाद, न तो भ्रान्ति रहती है, न परीक्षक रहते हैं और न जन्म-मरण ही…
  30. Verse 31तत््वज्ञानी परीक्षक के उपस्थित रहते आप कैसे कहते हैं कि परीक्षक नहीं रहते 2 उस्र पर कहते…
  31. Verses 32–33जिसके मन की गति अस्त हो चुकी है और जो आत्मा में शान्त है उसके ब्रह्मरूप से विद्यमान रहते…
  32. Verse 34इसीलिए उसको यह ससार नहीं रुचता, यह कहते हैं । बुद्धि आदि से लेकर सम्पूर्ण यह जगत्‌ दृश्य…
  33. Verse 35अहमर्थ का अभाव कैसे 2 इस आशंका पर कहते हैं / वस्तुतः चिदाकाश ही अपने स्वरूप के अन्यथा ज्ञ…
  34. Verse 36हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरे ही समान यथार्थवस्तु के ज्ञान से भ्रान्ति का नाश हो जाने पर आपका…
  35. Verse 37समस्त आचरण का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं / जो कुछ आप कर्म करते हैं, जो कुछ भक्षण करते ह…
  36. Verse 38आचारग्रहण समस्त जगत्‌ का उपलक्षण है. यह कहते हैं । जो मैं हूँ, जो तुम हो, जो इच्छाएँ ओर द…
  37. Verse 39जो कुछ बाह्य और आन्तर विषय हैं, जो भूत आदि तीन काल है तथा जो जरा, मरण, पीड़ा आदि हैं, वे…
  38. Verse 40दुःखशान्ति के उपायों के अन्वेषण से रहित, भ्रमशून्य, इच्छारहित, मन वर्जित, मुनि एवं अहंभाव…
  39. Verse 41हे श्रीरामभद्र, जिस तरह पवन का स्पन्दन और अस्पन्दन के द्वारा व्यवहार या अव्यवहार होता है,…
  40. Verse 42भद्र, जैसे काठ की पुरुषोचित चेष्टा का यन्त्ररूपी घोडे से निर्वाह होता है और वह जैसे वासना…
  41. Verse 43हे श्रीरामजी, माता, पिता, बन्धुजन आदि के साथ होनेवाला आपका बाह्य-व्यवहार न तो अत्यन्त स्न…
  42. Verse 44उपसहार दशती हैं / भद्र, जिसकी वासना मिट चुकी है, जिसको वर्तमान भोगों में कुछ रस नहीं रहा…