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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

सजातीयैकताभावाद्यद्वत्काष्ठ न चेतते । दारु तद्वदपि द्रष्टा दृश्यं नाज्ञास्यदाजडम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

दो काठ के सदश” यह जो व्यतिरेक दष्टान्त दिया है, उसकी समानता दा्ीन्तिक में बतलाते हैं / एक काठ दूसरे काठ को, अपना जातीय होने पर भी, चेतन की एकता न होने पर जैसे नहीं जान सकता, वैसे ही द्रष्टा भी चेतन की एकता से शून्य दृश्य को नहीं जान सकता