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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

ज्ञानरूपतयाबाह्यं बाह्यं चानुभवात्तथा । सत्यरूपमतः सत्यां विद्धि बाह्यार्थरूपताम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

कैसा भले ही हो, इससे प्रक्रत में क्या आया 2 इस पर कहते हैं / जैसे दीवार में रहनेवाला चित्र वास्तव में दीवार से अलग नहीं है, परन्तु भ्रान्तपुरुषों के अनुभव से अलग-सा भासता है, वैसे ही ज्ञान में कल्पा गया संसार वास्तव में ज्ञानरूप होने (८) वैशेषिकों का मत है कि दुःख के हेतुभूत द्रव्य, गुण, कर्म आदि सात बाह्य ही सत्य हैँ । (7) ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तथा प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के प्रकाशन की । के कारण ज्ञान से अलग नहीं है, किन्तु भ्रान्त पुरुषों के अनुभवरूप से अलग-सा भासता है । जब यही असली स्थिति है, तब बाह्यअर्थरूपता को भी, ज्ञान की सत्यता के कारण, ज्ञानरूप से सत्यरूप ही मानना चाहिए, यह आप जानिये