Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ब्रह्म सर्वपराण्वात्मा यो यस्मादर्थतोऽणुकः ।
स स तत्तद्भवेद्वस्तु वस्तुब्रह्मैव तिष्ठति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो-जो जिससे सूक्ष्म होकर कारणरूप से प्रसिद्ध ह, वह सव तो ब्रह्मकोटि में है और जो स्थूल
होकर कार्यरूप से प्रसिद्ध है, वह मायाकोटि में है तथा मिथ्या है, यह जानना चाहिए, यह कहते हैं ।
ब्रह्म ही सबसे परमअणुरूप है, इसलिए जो-जो जिस-जिस अर्थ से अत्यन्त अणु है, वह सब
तत्-तत् सूक्ष्मवस्तु है, ऐसी स्थिति में सर्वत्र ब्रह्मवस्तु ही स्थित है