Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मसर्गश्चित्तसर्गो द्वावेतौ सदृशौ मतौ ।
परमार्थस्वरूपत्वादक्षुब्धत्वात्सदैव च ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रान्ति से कल्या यया यह ससार चित्रम्रृष्टि के स्द्रश केवल मन की कल्पना से ही श्चन्ध-सा
भारता हैं, वस्तुतः नहीं; यह कहते हैं ।
श्रीरामजी, ब्रह्मसृष्टि और चित्तसृष्टि दोनों समान ही मानी जाती हैं, क्योंकि दोनों सृष्टियाँ
असल में परमार्थ ब्रह्म से न भिन्न हैं और न उनमें किसी तरह का क्षोभ ही है