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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चित्पश्यति जगन्मिथ्या स्ववेदनविबोधिता । व्योम्नि मायाञ्जनासिक्ता दृगिवाचलतान्तरम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

चेत्यरुप समस्त जग्रत्‌ वेतनस्वरूप ही है डस विषय का उपपादन करनेवाले महाराज वस्िष्ठजी भूमिका बोधते हैं महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, अपने में मिथ्या ज्ञान से यानी अब्रह्मरूपता के भ्रम से विक्षिप्त हुई चिति जगत्‌ को उस प्रकार देखती है, जिस प्रकार मायादर्शन हेतु अंजन से युक्त आँख आकाश में पर्वतरूपता को और पर्वत के शिखर, वन, हाथी आदि को देखती है

सर्ग सन्दर्भ

सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तीसवाँ सर्ग चित्‌ और चेत्य (विषय) दोनों के सम्बन्धभ्रम के निरास द्वारा उत्तम युक्तियों से चेतन ही जगत्‌ है यह वर्णन ।