Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यादृक्सत्तानि काष्ठानि तादृग्रूपं त्वचेतनम् ।
जानन्ति नेतरत्तस्माद्दृश्यं चिद्दृश्यचेतनम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
द्रष्टा ओर दृश्य की जड़ता मान लेने पर कोड भी दो काठ की अपेक्षा उनमें कुछ अधिकता नहीं
जान सकते, यह कहते हैं ।
काठ की जैसी स्थिति अपने सामने है, वही उनका जड़ रूप है, इससे अतिरिक्त दूसरे किसी
रूप को कोई नहीं जानते। अतः कथित तर्क के आधारपर समस्त दृश्य ओर द्रष्टा चिद्रूप से ही चिद्
अभिन्न है, यह सिद्ध हो गया