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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

चिन्मयत्वाच्चितौ चेत्यं जलमप्स्विव मज्जति । तेनानुभूतिर्भवति नान्यथा काष्ठयोरिव ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

जब द्रश्य और द्रष्टा को चिन्मय मानते हैं, तब अनुभव करनेवाली चिति में ही चेत्य (विषय का) अनुभव होगा । जल में गिरा हुआ जलबिन्दु जैसे जल में प्रवेशकर डूब जाता है, वैसे ही चिति में विषय प्रवेश कर डूब जाता है, इसी से “ईख का माधुर्य चखता हूँ” इस त्रिपुटी का चेतन में प्रवेश होकर ही अनुभव होता है इस प्रकार को छोड़कर दूसरा प्रकार हो ही नहीं सकता, क्योकि जड़ होने पर दो काठ के सदृश अनुभव नहीं होगा