Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अहमस्त्यविचारेण विचारेणाहमस्ति नो ।
अभावादहमर्थस्य क्व जगत्क्व च संसृतिः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए उसको यह ससार नहीं रुचता, यह कहते हैं ।
बुद्धि आदि से लेकर सम्पूर्ण यह जगत् दृश्य जिसे स्वतः नहीं रुचता आकाश के सदृश शान्त
उस पुरुष को उत्तम लोग मुक्त कहते हैं ॥३ ३॥
यदि आप तत्त्वज्ञ हैं; तो दीपनिर्वाण के स्रदरृश आप निर्वाणस्वरूप है, आप वस्तिष्ठरुप से केसे
हैं ? इस आशंका पर कहते हैं ।
अविचार से अहं है, विचार से अहं नहीं है। तात्पर्य यह कि अविचार से मैं वसिष्ठरूप से प्रतीत
हो रहा हूँ, विचार से कदापि नहीं । अहंभाव के अर्थ का अभाव होने से कहाँ यह जगत् और कहाँ
जन्ममरण आदिरूप संसृति ?