Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
भूतालोकस्तु माऽऽस्नेहो मा वाऽस्नेहश्च बाह्यगः ।
अनिर्देशधरालोकश्चित्रदीपवदास्यताम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, माता,
पिता, बन्धुजन आदि के साथ होनेवाला आपका बाह्य-व्यवहार न तो अत्यन्त स्नेह से पूर्ण
हो या न एकदम स्नेह से रहित ही हो, किन्तु वह व्यवहार ऐसा हो कि देखनेवालों को यह
पता न लगे-है या नहीं, यानी अनिर्वचनीय हो । आप चित्रदीप के सदृश रहिए। चित्रगत दीप
चित्रगत तेज से पूर्ण है, परन्तु परमार्थतः तेल से पूर्ण नहीं है, अतः उसका प्रकाश स्नेह (तेल)
से पूर्ण है या नहीं, इसका निर्वचन नहीं किया जा सकता