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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verses 28–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

मारैर्न किंचिन्म्रियते जीवैः किंचिन्न जीवति । शुद्धसंविन्मयस्यास्य समालोकस्य खस्य च ॥ २८ ॥ मिथ्या लोकस्य कचतो भ्रान्त्या मरणजन्मनी । असत्यपि भ्रान्तिभाजि मृगतृष्णानदीतटे ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

भा पुत्र आदि के मरणजीवन से उसको हर्ष या शोक नहीं होता; इस आशय से कहते हैं / ज्ञानवान न मरण-साधनों से मरता है ओर न जीवन-साधनों से कुछ जीता है । परन्तु विशुद्ध संवित्स्वरूप, आत्मप्रकाश सम्पन्न तथा चिदाकाशस्वरूप हुए इस महात्मा के असत्‌ भी मरण-जनन अज्ञानीजनों की ही भ्रान्ति से मृगतृष्णा नदी के तटों के सदृश भ्रान्त आत्मा में भासते हैं