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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 33

बत्तीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतीसवाँ सर्ग संवित्‌ की बाह्यमुखता के वारण से भ्रान्तिरूप कल्पना की प्रतिकल्पना (भ्रान्तिकल्पना के निवर्तक शास्त्रीय उपाय) ओर परलोक की चिकित्सा का वर्णन |

43 verse-groups

  1. Verse 1सबसे पहले प्रतिकल्यना को बतलाने के लिए उपक्रम करते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीराम…
  2. Verse 2ये जितने कल्पना से बने हुए तथा कल्पना के कारण अविद्या, वासना आदि अशास्त्रीय पदार्थ हैं, व…
  3. Verse 3कब तक ग्रतिकल्पना करनी चाहिए, इस पर समस्त कल्यनाओ की निवृत्ति जब तक न हो, तब तक“ यह कहते…
  4. Verse 4अनन्तर श्रवण, मनन से आत्यतत्व का निश्वय कर वाणी और मन का निरोधरूप प्रतिकल्पना करनी चाहिए,…
  5. Verse 5अनन्तर अनहम्भावरूप प्रतिकल्पना करनी चाहिए, यह कहते हैं । एकमात्र अहम्भाव को छोड़कर दूसरी…
  6. Verse 6आत्मा के विस्मरण से संसारताप से अवश्य तपेगे ओर यदि अहम्भाव का त्याग कर देंगे, तो समस्त दु…
  7. Verse 7पत्थर के सदृश अचल जिसको बहिर्मुखवृत्ति के अज्ञान से यह सब जगत्‌ असद्रूप होता हुआ भी शान्त…
  8. Verse 8परब्रह्म अशेषरूप से विलीनचित्त का - पत्थर के सदुश बाहर का परिज्ञान न होने से और भीतर चिति…
  9. Verse 9चुख और दुःख के लिए विषयों की सत्ता या असत्ता उपयोगी नहीं है किन्तु विषयों का दर्शन या अदर…
  10. Verse 10परलोक की चिकित्सा का वर्णन करने के लिए उपक्रम करते हैं । शरीरधारियों के लिए महाभयंकर दो व…
  11. Verse 11इस लोक में अज्ञानी पुरुष क्षुधा, तृष्णा आदि व्याधियों के लिए अन्न, पान आदि भोगरूप निकृष्ट…
  12. Verse 12जो उत्तम पुरुष है, वे परलोक की महाव्याधि की चिकित्सा के लिए शान्ति, सत्संगति तथा आत्मविचा…
  13. Verse 13जो पुरुष परलोक की चिकित्सा के लिए सावधान यानी अपथ्य भोगों के त्याग और सत्समागम आदि ओषध के…
  14. Verse 14परलोक की चिकित्सा परलोक में जाकर ही करेंगे, यहाँ पर उसकी चिन्ता करने से क्या फल 2 इस पर क…
  15. Verse 15हे अज्ञानीजनों, तुम लोग इस लोक की चिकित्सा में निरत होकर अपना जीवन क्षीण मत करो, परन्तु आ…
  16. Verse 16आयु तो ऐसी क्षणभंगुर (एक क्षण में नष्ट हो जानेवाली) है जैसा कि वायु से कम्पित हो रहा पत्त…
  17. Verse 17इस लोक की व्याधि की चिकित्सा के लिए दूसरे यत्न की आवश्यकता नहीं है, यह कहते हैं । परलोकरू…
  18. Verse 18परलोक की व्याधि के (लिए यद्यापि तपश्चर्या: तीर्थाटन, यज्ञ आदि चिकित्सा वला यह है, तथापि उ…
  19. Verse 19जो आत्मचिति का बहिर्मुखता से विस्तार है, वही बाह्य विषय और भीतरी विषय (काम, संकल्प आदि) ह…
  20. Verse 20जयत्‌ का रुप मिध्या ही हैं, इसलिए हजारें ग्रलयो से भी वह नष्ट नहीं होता या हजारों सृष्टिय…
  21. Verse 21आत्मज्ञान स्रम्पादन में कौन-कौन उपाय है 2 इस प्रश्न पर वैरग्य ही पहला उपाय हैं, यह कहते ह…
  22. Verse 22जिसने अपने मन के ऊपर विजय पाई नहीं है, भोगरूपी कीचड़ में फँसा हुआ वह मूढ़ पुरुष आपत्तियों…
  23. Verse 23जैसे आयु की सबसे पहली सीढ़ी बाल्यावस्था दिखाई पड़ती है, वैसे ही मोक्ष की पहली सीढ़ी रागों…
  24. Verse 24शय से शान्ति देनेवाला“ यह जो विशेषण कहा ग्या है, उसका तात्पर्य ज्ञानी और अज्ञानी की आउदुर…
  25. Verse 25ओर जो अज्ञानी हैं, उनकी आयुरूप नदियाँ तो अनेक तरह की दुःख क्रन्दनों की ध्वनियों से अत्यन्…
  26. Verse 26अन्ञानियों को अविचार से ही छृष्टि के प्रतिभासरूय विक्षेप उत्पन्न होते हैं; यही स्रंवित्ति…
  27. Verse 27भद्र, संवित्‌-रूपी जल के तरंग ही हजारों सृष्टियों के रूपों मे भासते हैं। जब उनके विषय में…
  28. Verse 28आत्मा की बहिर्मुखता के भ्रम से ही आकाश में भी अनेक तरह के गन्धर्वनगर आदि जगत्‌ सत्य-से भा…
  29. Verse 29आत्मा की बर्हिमुखतारूप जो जल है, उसी का यह जगत्‌भ्रम एक तरह से बुदबुद है और उसमें जो रूप…
  30. Verse 30आत्मा की बहिर्मुखता न होना ही समस्त जगत्‌ की निवृत्ति है ओर आत्मा की बहिर्मुखता ही सम्पूर…
  31. Verse 31चिद्रूप, अज, अव्यक्त, एक, अविकार, ईश्वर, स्वत्व और भावत्व से रहित ब्रह्म ही सर्वत्र है, व…
  32. Verses 32–33आत्मा की जो बहिर्मुखता है, वह निथ्याभ्रुत अविद्या का ही विलास है, नकि सत्यरुप ब्रह्म के स…
  33. Verse 34जैसे आत्मा में स्वप्न का अनुभव भ्रान्ति है, वैसे ही ब्रह्मरूपी समुद्र में अविद्याजनित सर्…
  34. Verse 35ङस प्रकार के ब्रह्मरूप की प्राप्तिकर स्थित रहना ही योगियों के लिए बहियुखिता का अभाव ओर मो…
  35. Verse 36उसी महात्मा को उत्तम मुनि कहते हैं, मिट्टी की मूर्ति के सदृश जिसका शरीर रहते भी विषयवेदना…
  36. Verse 37अकल्प ही जैसे सकल्परूप सृष्टि का निवारण हैं, वैसे ही अष्टि ही दष्टिचष्टि कानिवारण है, यह…
  37. Verse 38स्वभाव को छोड़कर यानी सब जड़ वस्तुओं में अनुगत जड़तारूप मूल अविद्या को छोड़कर जितने नाम-र…
  38. Verse 39परमार्थ में तो किसी पदार्थ का यहाँ कोई स्वभाव ही नहीं है, जितने ये अनुभव हैं, वे सब महाचि…
  39. Verse 40ये सभी अनुभव महाचितिरूपी वायु के स्पन्दन ही हैं, इसलिए वे सब अनुभव ब्रह्मरूप गगन की शून्य…
  40. Verse 41भद्र, जैसे वायु और वायु के स्पन्दन में कोई भिन्नता विद्यमान नहीं है, वैसे ही ब्रह्म और ब्…
  41. Verse 42कब तक वह श्रान्त रहती है, इस पर कहते हैं / जब तक तत्त्वार्थ का विचार विस्पष्ट नहीं हो जात…
  42. Verse 43श्रान्ति कैसे ब्रह्मरुपता को प्राप्त कर लेती है, इस पर कहते हैं / भ्रान्ति तो असत्य और अव…
  43. Verse 44समस्त श्रमो' का जब बाथ हो चुका, तब आखिर में बचे हुए ब्रह्मरूप को बतला रहे श्रीवश्तिष्ठजी…