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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

अनादिमध्यान्तमनन्तमच्छं समं शिवं शाश्वतमेकमेव । सर्वां जरामोहविकारभारभ्रान्तिं विमुच्याम्बरभावमेहि ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

समस्त श्रमो' का जब बाथ हो चुका, तब आखिर में बचे हुए ब्रह्मरूप को बतला रहे श्रीवश्तिष्ठजी श्रीरामजी को ब्ह्मरूपता की स्थिति में स्थापित करते हैं / हे श्रीरामजी, देह के सम्बन्ध से प्राप्त हुई सभी जरा, मोह, विकार आदि भारस्वरूप भ्रान्तियों को छोड़कर आप अब उस ब्रह्माकाशरूपता को प्राप्त कर लीजिए, जो आदि, मध्य और अन्त से शून्य है, अनन्त, स्वच्छ, सम, शिव, नित्य एवं अद्वितीय ही है