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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

प्रलयेष्वपि दृष्टेषु जगद्दृश्याख्यविभ्रमः । न नश्यति न जायेत भ्रान्तिमात्रैकरूपिणः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जयत्‌ का रुप मिध्या ही हैं, इसलिए हजारें ग्रलयो से भी वह नष्ट नहीं होता या हजारों सृष्टियों से अयना अस्तित्व भी नहीं रखता / यदि नष्ट होता है, तो आत्मा के ज्ञान से ही; इस आशय से कहते हैं / देखे गये प्रलयों में भी जगत्‌-भ्रम का न विनाश ही होता है या न देखी गई सृष्टियों में उसकी उत्पत्ति ही होती है, क्योकि उसका असलीरूप एकमात्र भ्रान्ति ही है