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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

कल्पना चाकल्पनान्ता मुक्तता यदकल्पनम् । एतच्च भोगसंत्यागपूर्वं सिध्यति नान्यथा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

कब तक ग्रतिकल्पना करनी चाहिए, इस पर समस्त कल्यनाओ की निवृत्ति जब तक न हो, तब तक“ यह कहते हैं । अतः आत्मा की मुक्तता कल्पना से शून्य है, अतः सब कल्पनाओं की निवृत्ति जब तक न हो जाय, तब तक प्रतिकल्पना करना चाहिए । यह कल्पनाशून्य मुक्तता पहले तो भोगत्याग से यानी वैराग्य ओर संन्यास से ही सिद्ध होती है, दूसरे किसी अन्य उपाय से नहीं । इससे वैराग्यरूप ओर संन्यासरूप प्राथमिक प्रतिकल्पना अत्यन्त आवश्यक हे