Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
स्वभाववर्जं शब्दार्थाः सर्व एव सहेतुकाः ।
स्वभावस्य तु यो हेतुर्मुक्तिस्तदनुभावनम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वभाव को छोड़कर
यानी सब जड़ वस्तुओं में अनुगत जड़तारूप मूल अविद्या को छोड़कर जितने नाम-रूपात्मक
पदार्थ हैं, उन सभी के प्रति वह मूल अविद्या ही कारण है, परन्तु मूल अविद्या का जो साक्षीरूप से
कारण है, उसका अनुभव करना यानी अपने में तद्रूपता का अनुसन्धान करना ही मुक्ति है