Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
एकमेव निराभासमचित्त्वमजडं समम् ।
न सन्नासन्न सदसदिदमव्ययमद्वयम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
आत्मा में स्वप्न का अनुभव भ्रान्ति है, वैसे ही ब्रह्मरूपी समुद्र में अविद्याजनित सर्गरूपता ब्रह्म की
तरंगें भी भ्रान्तिरूप ही हैं और कुछ नहीं । वस्तुतः आत्मा में न स्वप्न है एवं न सर्गरूपता ही है ॥३ ३॥
फरमार्थदशा में ब्रह्म का स्वरूप क्या हैं ? इसे कहते हैं /
ब्रह्म एक ही है, उसमें न कोई आभास है, न कोई चित्तस्वरूप दूसरा धर्म है, न जडता है, किन्तु
समता है। वह न सत् है, न असत् है, न सत्-असत् उभयरूप है। केवल इतना ही कह सकते हैं
कि वह अविकार है और दूसरे से रहित है