Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वपौरुषेण स्वधिया सत्संगमविकासया ।
यदि ना नीयते ज्ञत्वं तदुपायोऽस्ति नेतरः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सबसे पहले प्रतिकल्यना को बतलाने के लिए उपक्रम करते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, सत्समागम से विकास को प्राप्त स्वबुद्धि रूप
अपना ही पुरुषार्थ यदि पुरुष को तत्त्वज्ञान प्राप्त करा दे, तो फिर भिन्नतारूप कोई संसार
का कारण रहता ही नहीं
सर्ग सन्दर्भ
बत्तीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतीसवाँ सर्ग संवित् की बाह्यमुखता के वारण से भ्रान्तिरूप कल्पना की प्रतिकल्पना (भ्रान्तिकल्पना के निवर्तक शास्त्रीय उपाय) ओर परलोक की चिकित्सा का वर्णन |