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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

भ्रान्तिस्त्वसत्या वस्त्वेव प्रेक्षयातो न लभ्यते । शशश्रृङ्गवदत्यच्छमतो ब्रह्मैव शिष्यते ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रान्ति कैसे ब्रह्मरुपता को प्राप्त कर लेती है, इस पर कहते हैं / भ्रान्ति तो असत्य और अवस्तुरूप ही है, अतः विचार करने पर भी खरगोश के सींग की नाई वह प्राप्त नहीं की जा सकती । ऐसी स्थिति में अतिनिर्मल ब्रह्म ही बच जाता हे । तात्पर्य यह निकला कि भ्रान्ति में जो सत्ता स्फूर्तिरूप अंश है, वही ब्रह्मरूपता को प्राप्त करता है, दूसरी चीज तो कोई है नहीं, अतः दूसरे अंश के अभिप्राय से भ्रान्ति ब्रह्मरूपता को प्राप्त करती है, यह नहीं कहा जा सकता है