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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

सर्गवर्गाः प्रवल्गन्ति संवित्प्रसरलेशकाः । द्विचन्द्रबालवेतालमृगाम्बुस्वप्नमोहवत् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्ञानियों को अविचार से ही छृष्टि के प्रतिभासरूय विक्षेप उत्पन्न होते हैं; यही स्रंवित्ति की एक बलियुखिता है, यह कहते हैं / अज्ञानियों के लिए चिति की बहिर्मुखता के एक लेशमात्ररूप अनेक तरह के सर्ग ऐसे निकलते- रहते हैं, जैसे दो चन्द्रमा, बालवेताल, मृगतृष्णा के जल तथा स्वप्नमोह - ये अज्ञान से निकलते- रहते हैं