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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

इदमस्त्वथवा मास्तु चेतितं दुःखवृद्धये । अचेतितं सुखायान्तरचेतनमचेतनात् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

चुख और दुःख के लिए विषयों की सत्ता या असत्ता उपयोगी नहीं है किन्तु विषयों का दर्शन या अदर्शन उपयोगी है, इसलिए विष्यप्रकाश के लिए प्रवृत्ति करनेवाले चित्त का ही प्रथम निरोध करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं । यह दृश्य रहे चाहे न रहे, परन्तु प्रकाशित दृश्य यानी दृश्यदर्शन ही दुःख की वृद्धि का कारण है। अचेतित दृश्य यानी विषय का अदर्शन तो सुखका कारण है । पर विषयों का अदर्शन चित्तक्रिया के निरोध से जब तक ब्रह्माकारता की सिद्धि न हो जाय, तब तक की प्रतिकल्पना से होता है