Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
वचसा मनसा चान्तः शब्दार्थावविभावयन् ।
य आस्ते वर्धते तस्य कल्पनोपशमः शनैः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्तर श्रवण, मनन से आत्यतत्व का निश्वय कर वाणी और मन का निरोधरूप प्रतिकल्पना
करनी चाहिए, यह कहते है /
अनन्तर वाणी और मन से शब्द और शब्दार्थो की भीतर भावना न करते हुए जो स्थित रहता
है, उसकी कल्पना धीरे-धीरे शांत होती जाती है