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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

यथा शाम्यत्यसंकल्पात्संकल्पनगरं तथा । वेदनोत्थं जगदहं चिति शाम्यत्यवेदनात् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

अकल्प ही जैसे सकल्परूप सृष्टि का निवारण हैं, वैसे ही अष्टि ही दष्टिचष्टि कानिवारण है, यह कहते हैं । जैसे संकल्पजनित नगर सृष्टि असंकल्प से लीन हो जाती है, वैसे ही विषयवेदन से जनित अहंकारूप समस्त जगत्‌सूृष्टि अवेदन से चिति में लीन हो जाती है