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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 12

ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग अहंभाव भ्रान्तिमात्र है, जगत्‌ का भ्रम चिति का विवर्त है, उसकी मूल अविद्या है तथा अविद्या के नाश का क्रम क्या है-इन सबका वर्णन ।

38 verse-groups

  1. Verse 1अविद्या ही अहंभावरुपी खुक्ष्मप्रपंचभाव है / उसी की स्थूलरूपता होती है / इस रीति से समस्त…
  2. Verse 2द्ष्टान्त में कल्पना करनेवाला तो कड तीसरा ही पुरुष प्रतीत होता है वह तीसरा कौन है, यह पूछ…
  3. Verse 3जैसे आकाश में अद्वितीय आकाशात्मा ही है, दूसरे आकाश को तो कल्पक पुरुष का संकल्पअवच्छिन्न च…
  4. Verse 4इसलिए हे विद्याधर, प्रत्येक को यह समझ लेना चाहिए (7) देखो यह श्रुति क्या कह रही है - “यत्…
  5. Verse 5उस ब्रह्म की परम सृक्ष्मरुपता का उपपादन करते हैं / आकाश से भी अत्यन्तसूक्ष्म अज्ञानरूपी अ…
  6. Verse 6जैसे आवर्तं आदि विकार जलद्रव के प्रसार हैं, वैसे ही आत्मा में अहन्ता आदि आध्यात्मिक तथा आ…
  7. Verse 7चिति के विवर्तं का अभाव ही प्रलय है, जो निश्चल जलद्रव की नाई, स्पन्दनशून्य पवन के आकार के…
  8. Verse 8इस तरह देश, काल आदिजगत्‌ तथा इसके अवान्तर हजारों कार्यरूपी प्रसारो मे भी एकमात्र घन, शून्…
  9. Verse 9इसमें उपपत्ति दिखलाते हैं / चिति का ही विवर्तं होने से काल, आकाश, नौका,जल, स्थल, निद्रा,…
  10. Verse 10विति का जगत्‌ के आकार में परिणामस्वरूप वास्तविक प्रसार क्यो नहीं है, इस पर कहते हैं। आकाश…
  11. Verse 11चुख-दुःख आदि भोगो के अनुभवरूप तथा देह आदि में अहंभावरुप विकार तो चिदात्मा में दिखाई देते…
  12. Verse 12संकल्पशून्य आत्मा चिन्ता, लज्जा, हर्ष, भय, स्मृति, कीर्ति तथा इच्छा आदि मन की वृत्तियों क…
  13. Verse 13हे विद्याधर, ब्रह्मरूपी चन्द्रबिम्ब से स्फुरित जीव चिदाभासरूपी ज्योत्सना के अंशभूत चाक्षु…
  14. Verse 14इस तरह भगवान्‌ परमेश्वर के अपने से अभिन्न जगत्‌ के आकार में सर्वसाधारण सच्चिदानन्दात्मरूप…
  15. Verse 15दष्टान्त और काष्टान्तिक इन दोनों का रूपक द्वारा एकीकरण करके उपपादन करते हैं / मज्जन और उन…
  16. Verse 16जैसे आवर्तों से जल या दूर से धूमसमूह निबिड़ मेघरूप से भासता है वैसे ही ब्रह्म और मन इन दो…
  17. Verse 17आरी से लकड़ी चीरने पर जैसे आवर्त आदि भासते हैं वैसे ही देश-कालादि से शून्य परमात्मा में य…
  18. Verse 18मिथ्या होने से अपने स्वरूप से अत्यन्त कोमल तथा अधिष्ठान सत्ता से पत्थर की नाई अति दृढ़ इस…
  19. Verses 19–22पट के ऊपर विरवित चित्रगत राज्य के स्ाद्भश्य से अव इस जगत्‌ का वर्णन करते हैं / हे विद्याध…
  20. Verse 23अर्थशून्य तथा बाध्य होने से असत्यस्वरूप स्पन्दनात्मक विकल्पांश में यानी विकल्पात्मक वृत्त…
  21. Verse 24कसे प्रसरणशील होती है, यह कहते हैं / मन को क्षोभित करनेवाले कामवासना आदि जालसमूहों से निब…
  22. Verse 25इस रीति से यह आदिचिति ही अहंभावादि विकल्पों से बहिर्मुखी हो जीवभाव को प्राप्त करके भी परम…
  23. Verse 26उपाधि के अनुप्रवेश द्वारा नाम और रूपों का व्याकरण करनेवाले अहमर्थ जीव के बह्ममात्र होने स…
  24. Verse 27राहु का भिर" यहाँ पर जैसे राहु और उसके भिर में अभेद चिद्ध है यानी जो राहु हैं वही तो उसका…
  25. Verse 28जलद्रव की भेदकल्यना में देश और कालका भेद नियामक हैं / पूर्वकाल और पूर्व-देश में स्थित जल…
  26. Verse 29इस तरह विकल्पों के मन, अहंकार और दद्धि आदि से साध्य होने के कारण आकाश आदि सृष्टिभेद के वि…
  27. Verse 30किस- किस पोरुक से वह कितनी नष्ट होती है, यह बतला रहे है/ विनय, प्रणाम, दान, सम्मान आदि के…
  28. Verse 31पूर्वोक्त रीति से भूमिकाओं के अभ्यास द्वारा समकाल में और क्रमश: चार भागों मेँ विभक्त अविद…
  29. Verse 32स्रक्षेप से कही गई बात को विस्तार से चुनने की इच्छा कर रहे श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं / श्…
  30. Verse 33तदनन्तर हे मुनिनाथ, "समकाल में” और “क्रमशः” यह क्यों कहा जाता है ? तथा “वह नामार्थरहित सन…
  31. Verse 34अश्नक्रम के अनुसार महाराज वस्तिष्ठजी उत्तर देते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीराम…
  32. Verse 35संसारसागर से पार हो जाने की इच्छा रखनेवाले विद्वान्‌ को चाहिये कि वह जहाँ-कहीं से विरक्त,…
  33. Verse 36तो अन्य सब भूमिकाओं में ज्येष्ठ तथा साधनचतुष्टय सम्पत्ति से श्रेष्ठ शुभेच्छानामक प्रथम भू…
  34. Verse 37हे श्रीरामजी, अविद्या का आधा भाग तो सिर्फ सज्जन पुरुषों के सम्पर्क से ही नष्ट हो जाता है…
  35. Verse 38संसारबन्धन से मुक्त होने की कहीं एक उत्कट इच्छा उत्पन्न हो गई, तो उस मुमुक्षु पुरुष को वै…
  36. Verse 39सज्जनो की संगति, शास्त्रों की चर्चा और अपने प्रयत्न-इन सबकी एक साथ प्राप्ति होने पर समकाल…
  37. Verse 40अविद्या का क्षय हो जाना ही जिसका एकमात्र अपना स्वरूप है ऐसा जो अविद्या के नाश के बाद अकिं…
  38. Verse 41हे श्रीरामजी, यह परिशिष्टवस्तु, आनन्दैकघन, जरादिविकारशून्य अनन्त, एक ब्रह्म ही है । जीव ओ…