Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
ज्ञश्चेतति न भोगादि न चैवात्मन्यसावहम् ।
द्रवत्वमम्भसीवान्तरद्वितीयः परे स्थितः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चुख-दुःख आदि भोगो के अनुभवरूप तथा देह आदि में अहंभावरुप विकार तो चिदात्मा में
दिखाई देते हैं; यदि यह कड आशंका करे, तो उम्र पर कहते हैं ।
ज्ञानस्वरूप आत्मा विषयजनित सुख-दुःख आदि भोगों का अनुभव नहीं करता और न इस
आत्मा में यह तथा 'मैं' यह व्यवहार ही रहता है । किन्तु जल में द्रवत्व के समान अद्वितीय
आत्मा भीतर अपने कूटस्थ स्वभाव में स्थित हैं । तात्पर्य यह है कि भोगादि विभ्रम चिदाभास को
ही होते हैं, कूटस्थ आत्मा को नहीं होते