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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

देशकालादिनिर्माणपूर्वकं वेदनं विदः । सर्गात्मकत्वात्तेनाम्बुद्रवसाम्यं न दूरगम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जलद्रव की भेदकल्यना में देश और कालका भेद नियामक हैं / पूर्वकाल और पूर्व-देश में स्थित जल उत्तरकाल और उत्तरदेश में उपलब्ध होता है / उत्तरदेश की प्राप्ति भी क्रियापूर्वक ही बाण आदि में देखी गई हैं. इसी तरह जल में भी द्रवणक्रियाभेद की कल्पना कर चकते हैं । परन्तु अद्वितीय व्रह्म में तो देश और काल किसी का भेद नहीं है, अतः आकाश आदि भेदक कल्पना में क निमित्त न होने से जलद्रव का साम्य बहुत दूर वला गया यदि यह कर शंका करे, तो उस्रका समाधान देते हैं / सृष्टिरूप होने से, देश, काल आदि के निर्माणपूर्वक ही चिदात्मा के आकाशादि विकल्पज्ञान का हम वर्णन कर रहे हैं, इसलिए जलद्रव का साम्य कहीं दूर चला गया, यह कोई नहीं कह सकता । (८)