Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । सुजनेन विरक्तेन संसारोत्तरणार्थिना । सह चाप्यात्मविदुषां संसृतिं प्रविचारयेत् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

अश्नक्रम के अनुसार महाराज वस्तिष्ठजी उत्तर देते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, संसारसागर को तैर जाने की इच्छा रखनेवाले विरक्त सज्जन पुरुष को आत्मज्ञानी विद्वान्‌ तथा अन्य मुमुक्ष के साथ अपनी बुद्धि से यह विचार करना चाहिए कि यह संसार क्या है इसका परिणाम, मूल और सार क्या है तथा इसे तैर जाने का कौन-सा उपाय है ?