Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

हृल्लेखाजालविसरैः सर्वावर्तविवर्तनैः । विसरत्स्नेहसंमिश्रजडानुदयचर्वणैः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

कसे प्रसरणशील होती है, यह कहते हैं / मन को क्षोभित करनेवाले कामवासना आदि जालसमूहों से निबद्ध, सम्पूर्ण आवर्तरूप विकारों से समन्वित पुत्र, स्त्री आदि में फैल रहे स्नेह से मिश्रित मिथ्या होने के कारण उत्पन्न न हुए ही इन शब्द-स्पर्श आदि विषयों के बार-बार आस्वादनों के द्वारा जो संवित्‌ प्रसरणशील होती है चित्रगत महाराज्यरूप से वर्णित यह संसार है