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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

खे खात्मैवास्ति चिद्रूपं तत्स्वकं बुध्यते वपुः । भासते यदिदन्त्वेन नाहमस्मि न चानहम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे आकाश में अद्वितीय आकाशात्मा ही है, दूसरे आकाश को तो कल्पक पुरुष का संकल्पअवच्छिन्न चिद्रूप अपने संकल्पात्मक शरीर की ही उस रूप में कल्पना करके जानता है वैसे ही चूँकि अविद्या उपहित चिदात्मा अपने अविद्या रूप शरीर की “मैं और यह" इत्यादि अभिमन्ता और अभिमन्तव्यरूप से कल्पना करके अवभासता है । इसलिए अज्ञान से अन्य न अहंभाव है ओर न अनहंभाव ही हे