Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
खे खं जातमिति भ्रान्तेरहं कल्पयिता यथा ।
तथा निर्व्यपदेश्यात्म सदस्त्यसदिवाततम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
द्ष्टान्त में कल्पना करनेवाला तो कड तीसरा ही पुरुष प्रतीत होता है वह तीसरा कौन
है, यह पूछने पर उसे बतलाते हैं /
आकाश में ही दूसरा आकाश उत्पन्न हुआ है। इस भ्रान्तिका कल्पक जैसे अहंभाव है वैसे ही
अविद्या से आच्छादित होने से असत्-सा प्रतीत हो रहा अतएव शब्दादि से अव्यहार्य आत्मरूप
सद्वस्तु ही कल्पक है