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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

अर्धं मिथःसंकथया भागः शास्त्रविचारणैः । आत्मप्रत्ययतः शिष्टमविद्याया निवर्तते ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

किस- किस पोरुक से वह कितनी नष्ट होती है, यह बतला रहे है/ विनय, प्रणाम, दान, सम्मान आदि के द्वारा वशीभूत हुए तत्त्वज्ञानियों के साथ परस्पर आध्यात्मिक बातचीत करने के कारण प्रथम भूमिकापर्यन्त अभ्यस्त हुई उत्कट वैराग्य आदि चार साधनों की सिद्धि से पुत्र, स्त्री, धन आदि में ममताभ्यास के हेतुभूत इस अविद्या का आधा भाग नष्ट हो जाता है, श्रवण, मनन आदि शास्त्रविचारों से इस अविद्या का विक्षेप शक्तिरूप चौथा अंश-जो प्रमाण और प्रमेय की सम्भावना आदिरूप तथा देहादि में अहन्तारूप है-नष्ट हो जाता है तथा ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से उसका बचा हुआ आवरणशक्तिरूप चौथा भाग भी सूर्योदय के बाद अन्धकार की नाई धीरे-धीरे क्रमशः नष्ट हो जाता है