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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

संसारकदलीस्तम्भाद्विना संकल्पपल्लवम् । मृदुनोऽपि दृषत्क्रूरान्न किंचिल्लभतेऽन्तरम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

मिथ्या होने से अपने स्वरूप से अत्यन्त कोमल तथा अधिष्ठान सत्ता से पत्थर की नाई अति दृढ़ इस संसार रूपी कदलीस्तम्भ का स्फटिकशिला में प्रतिबिम्बित कदलीस्तम्भ से तनिक भी असाम्य विवेकदृष्टि से देखने पर नहीं मिलता | यदि कुछ मिलता भी है तो सिर्फ वह संकल्पकल्पित पल्लव विलक्षणता ही । कहने का तात्पर्य यह कि संकल्पकल्पित विलक्षण पल्लव के सिवा ओर कुछ तनिक भी वैसा दृश्य इन दोनों में नहीं मिलता