Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
मनोहंभावबुद्ध्यादि यत्किंचिन्नाम वेदनम् ।
अविद्यां विद्धि यत्नेन पौरुषेणाशु नश्यति ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह विकल्पों के मन, अहंकार और दद्धि आदि से साध्य होने के कारण आकाश आदि
सृष्टिभेद के विकल्य समय मे इनके असिद्ध होने से विकल्य की कल्पना ही केसे की जा सकती है 2?
यह आशंका भी अनुपपत्ति आदि हजाएं दोषों से पूर्ण एकमात्र अव्या का स्वीकार कर लेने से ही
अनायास परिह्त हो सकती है, इस आशय से कहते हैं /
(७) जलं स्पन्दते (जल स्पन्दित होता है) इस स्थल पर थोड़ा विचार किया जाय । क्या
जल ही स्पन्दरूप से स्थित रहता है या अन्य कुछ ? जल से भिन्न अन्य कोई स्पन्दनरूप से
स्थित रहता है, यह तो कह नहीं सकते, क्योकि अन्य किसी की यहाँ उपलब्धि नहीं होती । यदि
यही मान लिया जाय कि वहाँ कोई अन्य ही स्पन्दित होता है तब तो उस स्पन्दन को जल की
ही अपेक्षा है, यह नियम नहीं रह सकता । अतः दूसरा ही स्पन्दित होता है, यह प्रतीति होने
लगेगी और साथ-साथ यह भी नहीं कह सकते कि वह नियम समवाय के बल पर सिद्ध है, क्योकि
सम्बन्ध की अनवस्था होने से उसकी सिद्धि नहीं हो सकती । अब रही बात प्रथम पक्ष की । इस
पक्ष में जलस्पन्द का कर्ता नहीं हो सकता, क्योंकि स्पन्दात्मा स्पन्द नहीं करता, कारण कि यदि
वह स्पन्द करे, तो उस स्पन्द में कर्तृत्वापत्ति आ जायेगी । इसलिए यह सिद्ध है कि जल द्रव
अपनी स्पन्दात्मिका सत्ता में स्पन्दशून्य ही स्थित रहता है ।
(») आकाश आदि सृष्टि के विकल्प की असंभावना के ऊपर जो आक्षेप किया जा रहा है, सो क्या
आकाश आदि की सर्गात्मकदशा में आक्षेप किया जा रहा है या ब्रह्मदशा में यदि यह कहा जाय कि ब्रह्मदशा
में आक्षेप किया जा रहा है तब तो यह आपत्ति में इष्ट है, क्योकि ब्रह्मभाव में हम किसी तरह का कोई विकल्प
स्वीकार करने को तैयार नहीं है । यदि यह कहा जाय कि सर्गात्मकदशा में आक्षेप किया जा रहा है, तो इस
पर हमारा यह कहना है कि सर्गात्मकदशा में तो यह कहना ही पड़ेगा कि वह सृष्टिकाल प्रलयकाल से पूर्व
है। इस तरह कालविभाव और संसारासंसार देश भेद का भी कल्पना द्वारा निर्माण करके हम चिदात्मा के
हे विद्याधर, मन, अहंभाव, बुद्धि आदि जो कुछ भी विकल्पज्ञान है उस सबको तुम एकमात्र
अविद्या ही समझो, जो पुरुषप्रयत्न से शीघ्र ही नष्ट हो जाती है