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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

ततश्चिद्रूपमस्तीदृग्यत्र स्थूलं खमप्यलम् । अणाविव महामेरुस्तत्संवित्तिर्हि खादिता ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए हे विद्याधर, प्रत्येक को यह समझ लेना चाहिए (7) देखो यह श्रुति क्या कह रही है - “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्‌ तत्केन कं पश्येत्‌" । कि वह चिद्रूप एसा है कि जहाँ परमाणु के आगे महामेरु की नाई आकाश भी अति स्थूल है । सम्पूर्ण कल्पनाओं का अधिष्ठानभूत वह ब्रह्म परमसूक्ष्म है । उसी अतिसूक्ष्म ब्रह्मचिति की कल्पना आकाशादि यह स्थूल जगत्‌-रूप है