Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मेन्दुबिम्बस्फुरितचिज्ज्योत्स्नांशामृतद्रवः ।
दिक्कालासंभवात्सर्गो नेश्वरादतिरिच्यते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे विद्याधर, ब्रह्मरूपी चन्द्रबिम्ब से स्फुरित जीव चिदाभासरूपी
ज्योत्सना के अंशभूत चाक्षुष आदि ज्ञानमय अमृत का द्रवरूपी जो यह सर्ग है वह परमेश्वर से
भिन्न नहीं है, क्योकि इस सृष्टि के आधारभूत दिशा (देश) और काल इन दोनों का निरवयव
और निष्क्रिय ब्रह्म में रहना संभव नहीं है । दिशा के रहने पर ही मूर्तद्रव्य की क्रिया से सर्गकाल
की कल्पना की जा सकती है और वह क्रिया पहले से तो उपस्थित है नहीं । एवं काल के रहने
पर ही दिशा आदि की उत्पत्ति की कल्पना की जा सकती है, लेकिन प्रलय में वह भी नहीं है,
कारण कि क्रिया के अतिरिक्त उसका कोई साधक नहीं है । पूर्ण कूटस्थमें तो क्रिया का योग है
ही नहीं | ऐसी स्थिति में उन दोनों के अभाव मेँ किसी अन्य का अवकाश नहीं हे, इस तरह यह
सिद्ध है कि ब्रह्म से अतिरिक्त किसी पदार्थ की सिद्धि नहीं है