Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 22
इक्क सर्वाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग॑ पुनः देखे गये वसिष्ठ के अष्टम जन्म आदि का, सम ओर अर्धसम सृष्टि का तथा क्षीर-सागर के मंथन आदि का वर्णन ।
49 verse-groups
- Verse 1भुशुण्ड ने कहा : भगवन्, (जब मुझे अनेक युगो की आश्चर्यजनक घटनाओं का वैसा अभ्रान्त स्मरण ह…
- Verse 2पुलह, उद्दालक आदि तथा क्रतु, भृगु, अंगिरा आदि सिद्ध-ऋषि, सनत्कुमार आदि ब्रह्मर्षि एवं भृग…
- Verse 3गौरी, सरस्वती, लक्ष्मी, गायत्री आदि अनेक उनकी शक्तियों तथा सुमेरु, मन्दर, कैलास, हिमालय,…
- Verse 4हयग्रीव आदि दानवो; हिरण्याक्ष, कालनेमि, बल, हिरण्यकशिपु, क्राथ, बलि, प्रह्लाद आदि दैत्यों…
- Verse 5शिवि, न्यंकु, पृथु, उलाख्य, वैन्य, नाभाग, केलि, नल, मान्धाता, सगर, दिलीप, नहुष आदि राजा ओ…
- Verse 6आत्रेय, व्यास, वाल्मीकि, शुक, वात्स्यान आदि तथा उपमन्यु, मणीमंकि, भगीरथ, शुक आदि के विषय…
- Verse 7जो स्वल्पतर भूतकाल में उत्पन्न हैं, जो कोई कुछ दूर के हैं तथा जो आज के कल्प में उत्पन्न ह…
- Verse 8हे मुने, ब्रह्माजी के पुत्र आपका यह आठवाँ जन्म ह । उस आठवें जन्म में आपकी ओर मेरी संगति ह…
- Verse 9“आठें जन्मो में क्या मैं ब्रह्माजी का ही पुत्र रहा ?” महाराज वस्निष्ठ के इस प्रश्न पर पक्…
- Verse 10समस्त कल्पो मे तत्-तत् अधिकारी पुरुषों के नाम और स्वरूप एक से होने पर भी सब पदार्थों के…
- Verse 11मुनिवर, मुझे ऐसे दस सर्गो का स्मरण है-जिनमें देवताओं के निखिल आचरण तथा अवयव- गठन एकरूप थे…
- Verse 12आचारो की समानता बतलाकर अब उनकी विषमता बतलाते हैं। हे मुने, जल में डूबकर तिरोहित हुई पृथ्व…
- Verse 13हे महाराज, मन्दराचल के आकर्षण के लिए किये गये भारी प्रयत्न के कारण व्याकुल हुए देवता एवं…
- Verse 14महाराज, पहले स्वर्गस्थ समस्त देवताओं से कर लेनेवाला, हिरण्याक्ष तीन बार समस्त औषधियों तथा…
- Verse 15रेणुका के उदर से जन्म लेकर भगवान नारायण ने, परशुराम-अवतार से शून्य अनेक सर्गो के व्यवधान…
- Verse 16हे मुनिश्रेष्ठ, सौ कलियुग हुए ओर कीकटदेश के राजारूप से यानी महाराज शुद्धोधन के पुत्ररूप स…
- Verse 17महाराज, चन्द्रमौलि महादेवजी ने कल्पो में तीस बार त्रिपुरो का विनाश किया, दो बार यानी प्रत…
- Verse 18मुनिवर, बाणासुर के लिए माहेश्वर एवं वैष्णवनामक ज्वरो ओर प्रमथगणों को शौर्य उत्साह बढ़ाकर…
- Verse 19मुने, मेँ युग-युग में अध्येता पुरुषों की बुद्धियों के न्यूनाधिकभाव के कारण क्रियाओं की (ब…
- Verse 20हे पापशून्य, युग-युग में प्रत्येक द्वापर के अंत में निर्माताओं के भेद से अनेक पाठवाले, एक…
- Verse 21मुने, युग-युग में वेद आदि शास्त्रों के विद्वान व्यास, वाल्मीकि आदि महर्षियों द्वारा विरचि…
- Verse 22महाराज, मैं आश्चर्यजनक महती घटनाओं से परिपूर्ण, प्रसिद्ध रामायण से भिन्न दूसरे रामायणनामक…
- Verse 23उस ज्ञानशास्त्र में मनोयोग देनेवाले महानुभावो के अन्तःकरण में हाथ में फल के सदृश, “श्रीरा…
- Verse 24उक्त ज्ञानशास्त्र के निर्माता महर्षि वाल्मीकि हैं और अब उनके द्वारा वसिष्ठ राम-संवादरूप द…
- Verse 25महाराज वसिष्ठजी, इस भावी वसिष्ठ-राम-संवादरूप ज्ञानशास्त्र की पूर्वकल्प के अथवा दूसरे किसी…
- Verse 26महाराज, इसी ज्ञानशार्त्र के बराबर दूसरा ज्ञानशास्त्र था, जिसकी "महाभारत" इस नाम से प्रसिद…
- Verse 27उसी (पूर्वकल्प के) अथवा दूसरे किसी ओर व्यासनामक जीव के द्वारा किये गये तथा कल्पान्त में व…
- Verse 28हे मुनिराज, युग-युग में प्रवृत्त हुए अनेक आख्यानं एवं शास्त्रों का, जो चित्र-विचित्र घटना…
- Verse 29हे साधो, युग-युग में पुनः-पुनः उन्हीं -उन्हीं पदार्थो को तथा दूसरे-दूसरे पदार्थो को मैं ज…
- Verses 30–31भगवन्, राक्षसो का विनाश करने के लिए पृथ्वी में अवतार ग्रहण करनेवाले महिमाशाली विष्णु का…
- Verses 32–33हे महर्षे, नृसिंहस्वरूप शरीर से भगवान ने हिरण्यकशिपु का, हाथी का मृगेन्द्र सिंह की नाई, त…
- Verse 34बाहर यह उत्पन्न होता है, यह भ्रान्ति है, इस आशय से कहते हैं। महाराज, जगद्रूपा इस भ्रान्ति…
- Verse 35प्रत्येक सर्ग में भूलोक आदि की अवयवों से समानता का जो नियम है, वह भी औत्सर्गिक है, यों कह…
- Verse 36मनु आदि अधिकारी पुरुषों के आकारों ओर चरित्रों की समता भी औत्सर्गिक ही है, ऐसा कहते हैं ।…
- Verses 37–39ब्रह्मन्, प्रत्येक मन्वन्तर में जगत-क्रम का विपर्यास हो जाने पर, अवयव सन्निवेश का परिवर्…
- Verse 40निवासस्थान के भेद को ही विशवरूप से बतलाते हैं। महाराज, किसी समय मैं एकान्त में विन्ध्य-प्…
- Verse 41हे मुनिनायक, असंख्य युगो के बीत जानेपर भी इस समय प्राक्तन अवयवों के सन्निवेश (रचना) से ही…
- Verse 42हे साधो, इसीलिए अपने प्राक्तन शरीर का सूखपूर्वक त्यागकर यह वृक्ष पूर्वतन अवयवसन्निवेश की…
- Verse 43महाराज, मेरे पिता चण्ड के जीवनकाल में इस कल्पतरूप की जो शोभा थी, ठीक वही शोभा इस समय भी ह…
- Verse 44इसी प्रकार दिशा और पर्वत की ऐक्य-प्रत्यभिज्ञा भी शोभा-सन्निवेश की समता के कारण ही है, ऐसा…
- Verse 45तब उन दिशा आदि की नाई तुम भी प्रत्येक कल्प में दूसरे और समान सन्निवेशवाले क्यो नहीं हो ?…
- Verse 46इसी प्रकार पूर्व के अवयवो से भिन्न दूसरे अवयवो का ग्रहण करने पर भी उस प्रकारः प्रत्यभिज्ञ…
- Verse 47इस प्रकार अनियत स्थिति से दिशाओं का मिथ्यात्व सिद्ध होने पर तदनुसारी नियत अवयव- सन्निवेश…
- Verse 48जगत के पदार्थों में दिक्कृत व्यवस्था-व्यत्यास (विपरीतता) की नाई कालकृत व्यवस्था का व्यत्य…
- Verse 49मुनि महाराज, किसी कल्प में कलियुग में सत्ययुग के आचार, सत्ययुग में कलियुग की अवस्था तथा त…
- Verse 50संक्षेपत: कलियुग-स्थिति का वर्णन करते हैं। मुनिराज, किसी कल्प में सत्ययुग में भी कुछ ऐसे…
- Verse 51हे ब्रह्मन्, हजार चतुर्युगों की समाप्ति में ब्रह्माजी जब जगद्रूप के संहारक्रम से जल में…
- Verse 52उसी प्रकार जगत के लीन होने पर भी चन्द्रमा सम्बन्धी मन के मनन से निर्मित हुए पूर्वोक्त दस…
- Verse 53कथित समस्त अर्थो का संक्षेप से उपसंहार करते हैं। महाराज, ब्रह्माजी के दिवसरूपी कल्पो मे ह…