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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

आत्मस्पन्दचमत्कारविभवोऽयं विजृम्भते । पुत्रः पितृत्वमायाति मित्रं यात्यरितां तथा ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत के पदार्थों में दिक्कृत व्यवस्था-व्यत्यास (विपरीतता) की नाई कालकृत व्यवस्था का व्यत्यास भी दिखाई पड़ता है, ऐसा कहते हैं। महर्षे, किसी कल्प में पुत्र पितृ-भाव को प्राप्त होता है, मित्र शत्रु-भाव को प्राप्त होता है तथा सैकड़ों पुरुष स्त्री-भाव को प्राप्त हो जाते हैं - इसका मुझे स्मरण है